Friday, October 8, 2010

तारों की इन नज़रों को पहचान सखि !

चाँद की मुस्कराहट का अर्थ जान सखि !

कुछ सोच ! क्या तोड़ने के

लिए ही हैं मेरे अरमान सखि !

तारों की इन नज़रों को..

कुछ करो कि ये उम्र ठहर जाए

कुछ करो कि ये समय का चक्र ठहर जाए

हम-तुम रहें सदा

अब जैसे जवान सखि !

तारों कि इन नज़रों को...

इसलिये तो नहीं मेरे प्राण छटपटाए

इसलिये तो नहीं मैंने गीत बनाये

मैं तेरी याद में सुध-बुध खो बैठूँ

तू गुनगुनाए किसी और का गान सखि !

तारों की इन नज़रों को पहचान सखि !

चाँद की मुस्कराहट का अर्थ जान सखि !


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जवाँ अरमानों की लाश मिली थी

बदनाम बस्ती से कल रात

कुल शहर में पूछताछ की है

अभी तक शिनाख्त न हो सकी.

कहाँ जायेगी सबको पता है

कब जायेगी सबको खबर है

मगर लाश किस घर से निकली

ये बात अभी तक दरियाफ्त न हो सकी.

कब से मुफ्त की पी रहा है ज़ाहिद

उसे खुद भी याद नहीं

खुदा का फ़ज़ल देखिये,कहे है

अभी तक आदत न हो सकी.

ज़माना कर रहा है उनके मुकद्दर पे रश्क

और वो खुद को बदनसीब कहते हैं

लाख कोशिश की मगर उन जैसी

किसी की किस्मत न हो सकी.

वाइज़ एक उम्र से बता रहा है

मेरी महबूब और खुदा में अन्तर

समझता हूँ, फिर भी महबूब की

शान में कोई गुस्ताखी न हो सकी.


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खुदा की नियामतें फीकी पड़ जाएँ

मेरा महबूब गर मेहरबा हो जाए

तुमसे संभले न संभलेंगे शिकवे मेरे

गर मेरे दिल के फकत इक जुबां हो जाए.

कब तक यूँ रोके रहोगे

मेरी हसरतों के सैलाब को

हर बार ज़ब्त किया

चलो तुम्हारी आरज़ू जवाँ ह जाए.

मेरे चाहने में न थी कमी कोई

मगर क्या करे कोई

यह ज़मीं

अगर आसमां हो जाए .


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