Friday, July 6, 2018

उसने मुझे बारहा सताया है बहुत 
आज भी वो बेवफा प्यारा है बहुत 
मौसम तो फिर मौसम था 
प्यार  का मौसम भी बदल गया 
सितमग़र बदलेगा यक़ीं था
बदलने में मेहरबां ने वक़्त लगाया है बहुत
आज भी सपने देखता हूं
चाहे, अनचाहे देखताहूं
बस एक ही सपना है जो सच होता है
कभी ट्रेन छूट जाती है, कभी ग़लत ट्रेन
कभी सही ट्रेन, ग़लत स्टेशन पर उतार देती है
जाने वो सपना कब आयेगा जब सही ट्रेन 
सही समय सही स्टेशन पर उतारेगी
और जब तक ये सपना नहीं आता 
मैं लौट आऊंगा और फिर सपने देखूंगा
सपने देखता हूं इसलिये मैं जीता हूं
सपने देखता हूं इसलिये मैं हूं

Monday, April 3, 2017

मैं हैरान परीशां हूं कोई नयी बात नहीं
मेरा क़ातिल परेशां है मक़तल बंद देख


हर शख्स यहां पर वास्कोडिगामा, कोलंबस है
आप से काम अटका हो, यही एक शर्त बस है



तुम हौऊ यार क्या तै क्या है गये
कारे कऊआ से हते 'हैन्सम' है गये
जे सहर आ के तुमे का है गयौ कालीचरन
हमें कानोकान खबर हू न भई और
तुम न जाने कब में 'ऑफुल' तै 'ऑसम' है गये



रोटी जैसी छोटी सी चीज़ की फिक़्र न कर
तू ये देख बुत कितना दराज कद है तेरे हक़ में



तमाम उम्र इक इसी ख्वाब ने परीशां रखा
कभी गाड़ी छूट गई, कभी रस्ता भुला गये


नज़रें झुकाये ही कर गये ये हाल दिले बेताब का
नज़रें मिलती तो क्या होता हाल दिले बेताब का



नेकी कर रहा है या तिजारत कर रहा है
वो मुहब्बत भी तोल-माप से कर रहा है
हिसाब मांगे है मुझ से मेरे दिन रात का

नींद चुरा के, चोर सीना जोरी कर रहा है


तेरी मुहब्बत के मारों को दवा न दवाखाना मिला है
अलबत्ता! ज़हर पिया, तब से कुछ-कुछ आराम मिला है




Friday, November 11, 2016

तुम मेरे संग हो
काश: ये सफर
कभी खत्म न हो।
मंजिलों की जुस्तजू किसे ?
जब मंजिल खुद
मेरे संग हो।

Tuesday, November 1, 2016

तमाम उम्र इक इसी ख्वाब ने परीशां रखा 
कभी गाड़ी छूट गई, कभी रस्ता भूल गये

अक्सर मैं उदास हो जाता हूं

अक्सर मैं उदास हो जाता हूं
चिंतित हो उठता हूं
जब बच्चे कहते हैं “मैं रात को लेट आऊंगा”
या फिर “आज रात मैं दोस्त के घर ही रुक जाऊंगा”
मैं रोकने की स्थिति में नहीं हूं
वो बड़े हो गये हैं, कमाते हैं, इनस्टाग्राम, जी.पी.एस.
मैसेंजर, लिंकडिन, स्काइप और न जाने क्या क्या चलाते हैं
जब मन करता है जहां मन करता है आते – जाते हैं
पर मैं क्या करूं मैं फिर भी चिंतित हो उठता हूं
जब वे कहते हैं “आज रात लेट आऊंगा”
या फिर “देखता हूं दोस्त के घर ही रुक जाऊंगा”
ये महज़ मेरी एक्जायटी है या कहीं ये तो नहीं कि
मैं बूढ़ा हो रहा हूं.... अपने दिन भूल रहा हूं
जब लेट होने की हालत मैं पिताजी को बस स्टॉप
पर ही टहलता हुआ देखता था
देखता था माता जी अभी भी जगी हुई होती थीं
“बस नींद नहीं आ रही थी” कहती हुईं
पीढ़ी दर पीढ़ी हम सब इस स्थिति को जीने
और इस स्थिति का चक्रवृद्धि ब्याज सहित
सामना करने को अभिशप्त हैं ये हमारी नियति है      
  

Sunday, October 9, 2016

सयानों का कहा सच हो गया
मैंने उसे छुआ और पत्थर का हो गया
हज़ार बातें थीं कहने करने की
फक़त इक बात मैं भुला बैठा
वो मुस्कराये और मैं आँख मिला बैठा