Thursday, November 4, 2010

कुछ गज़ब नहीं होता

कोई अजब नहीं होता
कुछ गज़ब नहीं होता
कमाल है अब किसी बात पर
ताज्जुब नहीं होता

अपने बुजुर्ग की हत्या
जिगर के टुकड़े की बलि
पत्थरों के शहर में अब किसी को
दुःख नहीं होता

कैसे चले दूकान
आईनों की, अंधों के शहर में
क्या हैरत गर किसी का इधर
रुख नहीं होता

मर जायेंगे तुम्हारे बगैर
जी न पाएंगे तुम्हारे बगैर
सच है, मगर बार बार ये दोहराना
शुभ नहीं होता

Sunday, October 24, 2010

मेरी १०१ कवितायेँ

41

कैसे कैसे लोग बेशर्मी से
उनका जिक्र करते हैं
जबसे उनको
शरमाना आ गया

आँख क्यूँ अब उनसे
हटती ही नहीं
जबसे उनको
नज़रें झुकाना आ गया

सरे-शाम लो
रात हुई जाती है
उनको ज़ुल्फ़ लहराना
आ गया

समंदर की गहराई है
उनकी आँखों में
अब उन्हें भी राज़ छुपाना
आ गया

मेरा महबूब उतर रहा है
डोली से
मेरे घर में भी मौसम सुहाना
आ गया

४२

लाशों की कमी न रहेगी
कब्रिस्तान और शमशान में
मेरा शहर जब तक फ़र्क करेगा
इंसान और इंसान में

बेपनाह दौलत परदेश में छोड़
लौट आये हैं लोग
फ़र्क कुछ कुछ मालूम दे गया है
उन्हें घर और मकान में

गाँव छोड़ चले तो आये तुम
एक बार बाज़ार से गुजरे तो जानोगे
सब कुछ ही तो बिकाऊ है
मेरे शहर की दूकान में

उड़ने वाले तुम पहले नहीं
शख्स ऐ दोस्त !
परिंदे कुछ पुराने
हमें भी जानते हैं
इस आसमान में


४३

जहाँ रहती हों आबादियाँ
खंडहरों में
मुझे ले चलो उन्हीं हसीन
शहरों में

जिस्म की क़ैद से
मैं निजात पा जाता
मेरे शहर में तो ख्यालात भी रहते हैं
पहरों में

दरिया को आज फिर
किसी सैलाब का डर है
भूखी माँ कल बच्चों सहित डूबी थी
लहरों में

लोग कहते हैं
वो जनम से अंधा था
फिर रात रात किसे ढूँढता था वो भीड़ के
चेहरों में

४४

एक पूरी पीढ़ी ही
अनपढ़ रह गयी
कंप्यूटर ले कर देर से आये
नेताजी मेरे शहर में

भ्रष्टाचार की आग
फैली है सब ओर
फायर ब्रिगेड कौन बुलाए
सन सेंतालीस से खराब हैं
टेलीफोन मेरे शहर में

अभी नेताजी अफ्रीका समस्या
उठा रहे हैं अमरीका में
हो रहे हैं तो होते रहें
क़त्ल हरिजन मेरे शहर में

बाज़ार भाव बहुत नरम है
गुर्दा देखेंगे या खून लेंगे
आदमी की भारी ‘सेल’
लगी है मेरे शहर में

४५

देवदार के वृक्ष तले
निशा जब पलक खोले
प्रिय आकार मिलना
दूर पपीहा जा बोले

जब हो संध्या उदास उदास
कोई न हो नयन वातायन के पास
प्रिय आकर मिलना
जब टूट जाये अपनों का विश्वास

समाज की कोई रिवाज जब तुम्हें घेरे
अग्नि बाध्य करे लेने को फेरे
प्रिय आकार मिलना
जब दूर हों मुक्ति के सवेरे

व्यर्थ लगे जब यौवनावकाश
क्रूर काल देने लगे अपना आभास
प्रिय आकर मिलना
जब श्रृंगार करे तुम्हारा उपहास

बुझ चुके हों जब सारे दीप
बिछुड जाये मोती से सीप
प्रिय आकार मिलना
जब प्रलय हो समीप

४६

तुम चले आओ खत पाते ही
जहाँ तक बादल हैं
रास्ता साफ़ है
और आज धूप भी नहीं

समुन्द्र हिलोरें ले रहा
चांदनी से मिलने को
दूर बस एक अकेली नाव है
और आज धूप भी नहीं

कोयल की कूक है
नए फूल और खुश बहार है
कुछ मेरा भी खुशी पर हक है
और आज धूप भी नहीं

तमन्ना जवान है
दिल पे काबू
न कल था न आज
और फिर आज तो धूप भी नहीं


४७

क़ब्रिस्ताँ कुछ पहचाना
सा लगता है
कहीं यह मेरा
अपना शहर तो नहीं

साकी ने आज मुझे भी
दस्ते-नाज़ुक से पिलाई है
कोई देखे ज़रा
इसमें ज़हर तो नहीं

आहें, चीख-पुकार
हर सू आलमे बदहवास
ठहरो याद कर लूँ यह मेरे
महबूब की रहगुजर तो नहीं

यह क्यूँ दुश्मन भी मेरी मिजाजपुर्सी को
चले आये हैं आज
कल सुबह तुम आ रही हो
कहीं इन्हें ये खबर तो नहीं

तुम्हारा खत भी गायब है
मेरा क़ासिद भी
ज़रा देखो तो सही वह मेरे
रकीब के घर तो नहीं


४८

ठण्ड से मर गया कल रात
एक भिखारी
कम्बल ले कर देर से आये
नेताजी मेरे शहर में

अंधे कुँए में फिर एक लाश मिली है
रोटी का ब्याज
शरीर से लेते हैं
महाजन मेरे शहर में

कुछ ज्यादा ही
डरे डरे हैं लोग
पुलिस मना रही है
‘शालीनता सप्ताह’ मेरे शहर में

भयानक चेहरों को देख
नाहक ही डर गए लोग
हर चेहरे पर दूसरा चेहरा
लाजिमी है मेरे शहर में

४९

वो आये ही जाते हैं
ऐ उम्मीद न जा
यूँ छोड़ कर.. ठहर
अभी कुछ देर और

शाम का वादा था,रात जाने को है
वो आते ही होंगे, ऐ शमां
जलो मेरे साथ
अभी कुछ देर और

मैं तेरी जुदाई के ख्याल से
हूँ अश्कबार
रो लेने दो
अभी कुछ देर और

एक उम्र के इंतज़ार के बाद आया है
न जाने फिर कब आना हो तेरा
ऐ सावन बरस
अभी कुछ देर और

खामोश, गुमसुम देख
मुहब्बत का गुमाँ होता है
यूँ ही रहो खफ़ा
अभी कुछ दे और

जुदाई की शब है, फिर मिले न मिले
ज़ज्ब कर लूँ हर अदा
याद कर लूँ हर वाकया
बैठी रहो मेरे पहलू में
अभी कुछ देर और


५०

प्रिय भूल न जाना
किये थे जब
हरी दूब पर बैठ
हमने कुछ प्रण

पूछेगा प्रश्न बीता हुआ कल
आनेवाले कल से
मांगेगी उत्तर हर लहर
उठते गिरते झरने की कलकल से

क्या दोगे तुम तब ?
इसलिए कहता हूँ
बिसरा न देना मेरा नाम
अपने स्मृति पटल से
रही एक ही जान
चाहे रहे हों दो तन
प्रिय भूल न जाना

कोई आश्चर्य नहीं
उन स्थितियों में
हम-तुम दोनों बदल जाएँ
अपनी परिस्थितियों में
संभव है तुम मग्न हो जाओ
विजयोल्लास में
या दूरी बन जाये बैरिन
हमारे मिलाप में

लेकिन बैठे होगे
जब तुम अवकाश में
मुझे विश्वास है
मेरी याद मेघ बनके घिर आयेगी
तम्हारे हृदयाकाश में
हाय कैसे कट पाएंगे वे दिन
प्रिय भूल न जाना ..
माना भौतिकता के दायरे में
जिंदगी बंधी है
किन्तु सुना है मैंने यह भी
ह्रदय से ह्रदय की बंधी है

होने दो अपने ह्रदय पर
मेरी स्मृति का हिमपात
रुको ! मत हटाओ
मेरी यादों के हिमकण
क्या तुम भूल गए वो क्षण
किये थे जब हरी दूब पर बैठ
हमने कुछ क्षण

Saturday, October 23, 2010

मेरी १०१ कवितायेँ

३१
एक बात तय हो गयी
तुम से दूर रह कर
हम जी नहीं सकते
तुम से दूर रह कर

सब्र का इम्तिहां नहीं
ये तो और क्या है
हम रो नहीं सकते
तुम से दूर रह कर

वो शख्स किस मिट्टी के थे
जिन के घाव वक्त ने भर दिए
हम तो और भी छलनी हुए
तुम से दूर रह कर

देखा मुझे तो खास दोस्त भी
पहचान नहीं पाए
कितने बदल गए हम
तुम से दूर रह कर

अब शहर भर में बदनाम हूँ
तो सुकून है दिल को
मुहब्बत में मुझे भी कुछ हासिल हुआ
तुम से दूर रह कर


३२
लाख बुराई सही पर
आदमी अच्छा था
यह अहसास
छोड़ जाऊंगा

मशहूर हैं तेरी दुनियां में लोग
दिमागो दौलत के दम पर
मैं तो बस अपने ज़ज्बात
छोड़ जाऊंगा

बरसों तक भुला न सकोगे
दोस्त खुशबू कुछ ऐसी
आस-पास छोड़ जाऊंगा

खुदारा मुझ को यूँ न सताओ
बार बार दूर जा कर
क्या पता कब तुमको अश्कबार
छोड़ जाऊंगा.


३३

तेरी याद, तेरा ख्याल
तेरी उल्फत, तेरा गम लिए
इस दुनियां में रहे
गो कि बेशुमार दौलत
और लुटेरों की बस्ती में रहे

माल, असबाब,इज्जत,शोहरत
सब आसां थी मगर
हम तुम से मिलने की खातिर
तमाम उम्र सफर में रहे


३४

इक शख्स अक्सर
मेरे ख्वाब में आये है
मैं तो अनजान हूँ

घबराया,सहमा,ढूँढता फिरता है
न जाने किस दरबदर
बोलता कुछ नहीं बस
दिल के ज़ख्म दिखाए है

ये माहौल, ये बंदिशें
ये सावन, ये बारिशें
तुमसे भी कुछ कहती हैं
या बस मुझे ही तुम्हारी याद सताए है

लोग रिश्ते बदल रहे हैं,लिबासों की तरह
तू न जाने किस दौर का है
एक दिल के टूटने का गम
दिल से लगाये है

दोस्त सब्र करके देख
सब्र से दुनिया है
यूँ भी कभी
क्या मांगने से मौत आये है


३५


दुश्मन है गर तू तो
सीने पर घाव क्यों नहीं करता
और अगर मेरा है तो
अपनों सा बर्ताव क्यों नहीं करता

सदियों से जल रहा है आदमी
दोज़ख की आग में
ऐ खुदा रहमतों की
बरसात क्यों नहीं करता

ईमान, मस्ती, वफ़ा, दोस्ती
यूँ सब पे लुटाने की चीज़ नहीं
तू अपने में
बदलाव क्यों नहीं करता

शमां बनके जले सारी उम्र जिनके वास्ते
उनकी बर्फ सी खामोशी न सही जायेगी
ऐ खुदा मेरे सीने की जलन को
अलाव क्यों नहीं करता

हम तूफां के पाले हुए हैं
नाखुदा लहरों का खौफ कैसा
आजमाना है तो हर लहर को
सैलाब क्यों नहीं करता


३६

मुझ से मत पूछ क्या है
तेरा इश्क
कभी प्यास,तो कभी दरिया है
तेरा इश्क

तुम्हें देख खुदा में
यकीं आ गया
कभी कुफ्र तो कभी इबादत है
तेरा इश्क

तुम्हें जानने से पहले
जाना न था दर्द मैंने
कभी आँसू तो कभी कहकशां है
तेरा इश्क

अपनी जिंदगी सा तराशा है
तेरा हर कौल हमने
कभी पत्थर तो कभी शीशा है
तेरा इश्क

तेरी उल्फत ने भुला दी
वक्त की तमाम हिदायतें
सदियाँ गुजर गयीं फिर भी नया नया सा है
तेरा इश्क


३७

जुल्मो सितम के अब कुछ
और नए मंज़र होंगे
शिकारी के हाथों में
परिंदों के पर होंगे

वो बहुत दूर तक जायेंगे
ये तो खबर है लेकिन
शाम तक इस बाज़ार में
हम किधर होंगे

वो हैं कूँचा-ऐ-यार में
जाने को तैयार
उम्मीदें, ज़ख्म,आँसू
फिर उनके हमसफ़र होंगे

घाव नया है कह के
बहला रहे हैं
दोस्त उनके कुछ गम तो
मेरे साथ उम्र भर होंगे

वो उदास,खफा
अनमने बैठे हैं
वजह कुछ भी हो देख लेना
सब इलज़ाम मेरे सर होंगे


३८

अंधों के शहर में
आईने बेचने निकले
यार तुम भी मेरी तरह
दीवाने निकले

किस किस के पत्थर का
जवाब दोगे तुम
महबूब की बस्ती में
सभी तो अपने निकले

वो हँस कर क्या मिले
तमाम शहर में चर्चा है
तेरी एक मुस्कान के मायने
कितने निकले

ऐ दोस्त! कैसे होते हैं वो लोग
जिनके सपने सच होते हैं
एक हम हैं. हमारे तो
सच भी सपने निकले


३९

दिल देखिये. . उसका शहर देखिये
आज के दौर में
मुस्कराए कोई
तो उसका जिगर देखिये

मेरी उम्र से लंबी है
हिज्र की रात
होए है कब
इसकी सहर देखिये

वो आये महफ़िल में तो उसकी बात हो
न आये तो उसकी चर्चा होए है
कौन सिखाए है उसे
नए नए हुनर देखिये

रकीब के इलाके में
कल जश्न था
उसकी गली से रस्ते
जाये हैं किधर देखिये

वो सितमगर अक्सर
मेरे ख्वाब में आये है
क़ासिद उन पर मेरी
मेहमान नवाजी का असर देखिये


४०
इस शहर का इंतजाम शानदार लगा
हर बेईमान यहाँ ईमानदार लगा

इतनी गर्मजोशी से मिला आज दोस्त मेरा
मुझे दिल ही दिल में उससे डर लगा

सूखा...भूकंप...और फिर बाढ
मंत्री को ये साल बहुत ही कामयाब लगा

बड़ी उम्मीद से आया था
वो गाँव के जलसे में
इंसानों की भीड़ में न कोई हिंदू न मुसलमां
नेता को ये गाँव बड़ा नागवार लगा

ईमान.इखलाक और बेपनाह मुहब्बत
ये मुफलिस भी मुझे खूब मालदार लगा

ये तरक्की के किस दौर में आ गयी है कौम
शहर में हर शख्स एक-दूसरे से खबरदार लगा

Friday, October 15, 2010

मेरी १०१ कवितायेँ

(21)

एक तुम्हारा साथ पा
मैं तरक्की की
बुलंदियां
पार कर जाऊँगा

एक तुम जो बनो हमसफ़र मेरी
सच कहता हूँ मैं
तूफानों को क़ैद
कर लाऊंगा

तुमसे अलग मेरी जां
मेरी जां कुछ भी नहीं
मैं मैं नहीं, हूँ भी तो
मेरी पहचान कुछ भी नहीं

तुम ही तो मेरी जिंदगी भर की दौलत हो
मेरा जोश,मेरी शोहरत,मेरी ज़रूरत हो

ये दुनियां तो बस ख्वाब है दीवाने का
इस में बस तुम ही एक हकीक़त हो

(२२)

आज नहीं तो शायद
कल पता चल जाए
ये मेरा इश्क है
तेरा हुस्न नहीं
जो ढल जाए

मेरी दीवानगी देख
मेरी वफ़ा देख
तू फैसला कल पे न छोड़
कौन जाने कब ये मंज़र
बदल जाए

तेरा हर कॉल मुझे मंजूर
मैं अगले जनम तक
फिर तेरा इंतज़ार कर लूँगा
चल तेरा ये अरमां भी
निकल जाए

(२३)

किसी खुशनुमा शाम को
और खुशनुमा बनाएँ
चलो एक शाम हम
साथ-साथ बिताएं

न मैं कहूँ तुम्हें जिंदगी
न तुम कहो मैं तुम्हारा सब कुछ
न हम साथ-साथ
जीने-मरने की कसमें खाएँ

चलो एक शाम हम
साथ साथ बिताएं
किसी खुशनुमा शाम को
और खुशनुमा बनाएँ

न तुम मेरे लिए
ज़माने से करो बगावत
न आसमां इतना करीब कि तारे तोड़ लाएं
बस एक दूसरे को बेहतर जानें
इस समझ के सिलसिले जमाएं

किसी खुशनुमा शाम को
और खुशनुमा बनाएँ

न कोई आरज़ू
न कोई इसरार हो
न हम एक दूसरे की
कमियां गिनाएं
बस हँसें,चहकें और मिलके गाएं

एक शाम ऐसी भी
हम साथ साथ बिताएं

(२४)

दिल लिखना, नसीब लिखना
दर्द लिखना. जिंदगी लिखना
कितना मुश्किल है
उनपे कुछ भी लिखना

गेसुओं पे क्या कहूँ
जो पहले नहीं कहा
उनकी ये जिद
इनपे फिर भी कुछ लिखना

नर्म गुलाब पंखुड़ी से होंठ तेरे
अता करें जिंदगी
मुश्किल है इस से बरतरफ
इनपे कुछ भी लिखना

तेरी आँखों का मशकूर मैं
इस जनम फिर मुझे पहचान लिया
मुमकिन नहीं इनकी जादूगरी पे
और कुछ भी लिखना

दिल लिखना, नसीब लिखना
दर्द लिखना, जिंदगी लिखना
कितना मुश्किल है
उनपे कुछ भी लिखना


(२५)

सदियों मेरी चाहत
मेरी बेखुदी का
सिलसिला रही है तू

तेरे दम से रही
रगे जां में हरकत
मेरी जिंदगी का हसीं
वलवला रही है तू

मेरे दर्द को इक
हस्ती अता की
सचमुच बड़ी करमफरमा
रही है तू

यूँ इसे मत तोड़
कुछ तो ख्याल कर
आखिर जिंदगी भर
इसी दिल में रही है तू


(२६)

तुम क्या उठे महफ़िल से
ढूँढता फिर रहा हूँ
न जाने कहाँ खो गयी
मेरी जिंदगी

एक बार तुम पलट के देख लो
इस उम्मीद में
दूर तक तुम्हें जाते देखती रही
मेरी जिंदगी

ये मानने में गुरेज़ कैसा
तेरी रहगुज़र से जब भी गुजरा हूँ
वहीँ ठहर के रह गयी
मेरी जिंदगी

न कोई उमंग, न कोई खुशी
मैं जिंदा हूँ
पर कहाँ है
मेरी जिंदगी

आज पूछते हो तो सुनो
मेरे जीने का राज़
जादूगर की जान सी तुझमें बसती है
मेरी जिंदगी

(२७)

इस शहर की भीड़ में
अब कहाँ दोस्त भी
दोस्त की तरह मिलते हैं

यूँ तो सारे अज़ीज़ इसी शहर में हैं
पर ज़माना कुछ ऐसा बदला है
काम पड़े तभी
दोस्त की तरह मिलते हैं

शहर भर में बदनाम हो गए
हम अपनी आदत से परेशां
जिससे मिलते हैं
दोस्त की तरह मिलते हैं

अपना शहर छोड़ तेरे शहर में आ गए
बड़ा सुकून है दिल को
तेरे यहाँ तो अजनबी भी
दोस्त की तरह मिलते हैं

(२८)

उसके मिजाज़ को
हमसे बेहतर कौन समझा है
हमने उसका हर नाज़
उठा रखा है

अब ये भी नहीं
हम कभी खफा ही न हों
बस इतना है हमने ये काम
कल पे उठा रखा है

ज़ज्बा-ऐ-इश्क
फल-फूल रहा है आज भी
कहने को इसने आसमां
सर पे उठा रखा है

अपने बंदगी खुद
करा लेती है
काफिर जवानी ने वो
अहद उठा रखा है

(२९)

वो बोलने पाती तो
कोई बहाना लगाती
सब कुछ सच-सच
कह देती है ये ख़ामोशी

तुमने अच्छा अहद लिया
होंठ सीने का
हमें तो अपनी जान दे के
निभानी पडी ये ख़ामोशी

ज़माने को चाहिए
नए नए अफ़साने दर रोज
दुनियां बहुत देर तक सहे
ऐसी नहीं है ये ख़ामोशी

आज फिर माहौल
अपने हक में नहीं
महफ़िल में उनकी बड़ी
गुमसुम सी है ये ख़ामोशी

(३०)

हम दोनों ने खूब दस्तूर
निभाए मुहब्बत के
तुमने बेजा आरज़ू न की
मेरा कोई अरमान न हुआ

लोग सुनते है और आज भी हँसते हैं
ये कैसी मुहब्बत थी
तुमने आहें न भरीं
और मैं बदनाम न हुआ

दोस्त हमारी मुहब्बत किसी
किसी इबादत से कम न रही
वरना बताये कौन यहाँ
इश्क में तबाह न हुआ

मुहब्बत दो रूहों के
एक हो जाने का सिलसिला थी
इसमें खुदा से अलहदा
हमारा कोई राजदार न हुआ

Thursday, October 14, 2010

मेरी १०१ कवितायेँ

(15)

हमने लिखे थे जो तुम्हारे नाम खत
सिवा तुम्हारे शहर में सबने पढ़े वो तमाम खत

हर सफा था खास, हरेक हर्फ़ में थी हमारी खुशबू
फिर कैसे हो गए हमारे वो बेनाम खत

दिले नाकाम को क़ासिद ने समझाया
“उम्र भर इक छोटे से जवाब को तरसते रहे
मियाँ किस जुबां में लिखते हो तुम खत”

वो बरसों लेने से इनकार करते रहे
हम बरसों लिखते रहे खूने दिल से खत

मैं शब-ए-जुदाई सुकून से मर सका
वो हौले से बोले “भला कोई
अपनों को भी लिखता है यूँ खुले आम खत”


(१६)

तालीमयाफ्ता तो बहुत है मेरा महबूब
सीखनी आंसुओं की जुबां अभी बाकी है

ऐ सात समंदर के सैलानी,सफर खत्म कहाँ
मेरी आँखों में देख, आसमां अभी बाकी है

आपने जो ज़ख्म दिए,मुमकिन नहीं एक जनम में भरें
नज़दीक से देख, पिछले निशाँ अभी बाकी हैं

तेरे ज़ुल्मों ने मुझे इस क़दर मज़बूत कर दिया
तुम किस्सा तमाम समझ भूले थे
पर देख ये सख्त जान अभी बाकी है

ये वादा रहा तेरी महफ़िल से चले जायेंगे
सामान सब बंध गया
तेरी एक मुस्कान अभी बाकी है


(१७)

मैं तो खामोश चला था सरे राह
जिंदगी के हर रास्ते उसका घर निकला

दो बूँद का प्यासा था वो
उसकी हर बूँद में सागर निकला

मेरे बच निकलने की कोई तदबीर न थी
शहर के हर मोड़ पे सितमगर निकला

ये जानते तो जान से क्यूँ जाते
वो तबस्सुम महज़ उसकी आदत निकला

उनसे नज़र मिली फिर होश न रहा
बस इतना याद है मेरा सर झुका था
जब उसका खंज़र निकला

(१८)

यूँ तो इन्साफ मेरे साथ था
पर मुंसिफ तुम्हारा निकला

हम ये किस शहर में आ गए
दीवाना हर शख्स तुम्हारा निकला

मेरी चाहत ने उनमें रंग भर दिए हज़ार
मुझसे मिलके आईना देखा
वो भी दीवाना तुम्हारा निकला

मैं तो वसीयत में खुद को
खतावार लिख मरा हूँ
अब क्या फ़र्क भले कुसूर
तुम्हारा निकला


(१९)

तेरी पेशानी चूम के कभी
मैंने खुदा से दुआ की थी
आज तुझे खुश देख
अपनी दुआ में यकीं आ गया, यकीं आ गया

फ़लक पे सितारे टिमटिमाते हैं अज़ल से
महफ़िल तो तेरे आने से रोशनजदा हुई
सब कहने लगे देखि महज़बीं आ गया
महज़बीं आ गया

गुलशनपरस्त तो हम भी कम न थे
पर कलियों की रुसवाई देखी न गयी
जिस घड़ी गुलशन में बेनकाब
वो पर्दानशीं आ गया,पर्दानशीं आ गया

वो हसीं है खुदा उसकी
जवानी को बरकत दे
मैंने जब जहां बुलाया
मेरा जान-ऐ-जां वहीँ आ गया,वहीँ आ गया

(२०)

जिंदगी के तमाम अजूबों से
हँस कर गुजर गए
जब से हैरत में डालने का
वादा कर गया कोई

कुल शहर से नज़रें
चुरा रहे हैं हम
जब से ख्वाब में आने का
वादा कर गया कोई

ताउम्र समंदर से खाली हाथ
लौटते रहे
नसीब देखिये किनारे पे मेरे नाम
मोती रख गया कोई

हम तो हिसाब-किताब में
वैसे ही कमज़र्फ थे
रोज रात तारों की गिनती
क्यों मेरे नाम कर गया कोई

जाहिर है वो मुझसे खफा हैं
तू भी उनका पर्दा रखना ऐ क़ासिद
कहना “कल हौले से ले उनका नाम
मर गया कोई “

मेरी १०१ कवितायेँ

(१३)

मुहब्बतों की दूरियों में अजब फासले हैं
कहीं एक बार मिल के उम्र भर का गम
कहीं उम्र भर साथ रह कर भी फासले हैं

कितनी ही क्यों न सिमट जाएँ मेरे शहर की सरहदें
दो भाइयों के बीच अभी बहुत फासले हैं

आँखें मेरी, आँचल तेरा, गम आते तो कैसे
हम इसी खुशफहमी में रहे दोनों में बहुत फासले हैं

हम तुम्हें चाहा किये जिस तरह
तुमने चाहा ही नहीं हमें उस तरह
वरना दो धडकनों के बीच कहाँ फासले हैं

तुम सबके दिलों पे राज़ करने की चाहत में मगरूर हो
शहर में सब जानते हैं वफ़ा से तुम्हारे जो फासले हैं

गर्मजोशी से मिलना महज़ आदाब बन के रह गया
जानते आप भी हैं जो दिलों में फासले हैं

अफ़सोस दोस्त ! इक़रार आया, न तुम्हें
मुहब्बत का इनकार आया
वरना लोग हँस हँस के क्यूँ पूछते
“कहाँ तक पहुँचे...अभी कितने फासले हैं ?”


(१४)


तुमसे कभी मिले नहीं
तुम्हें कभी देखा नहीं
ताउम्र बुतपरस्त रहे
हम तेरी तस्वीर के

लाख मौसम आये गए
.... बदला करे
हर बार और शोख हुए
रंग तेरी तस्वीर के

मेरी खुशी में खुश
मेरे गम में ग़मगीन
एहसास एक से रहे
मेरे दिल औ तेरी तस्वीर के

कभी बहार कभी गुल
कभी चाँद,कभी झील
दुनियां ने कितने
नाम दिए तेरी तस्वीर के

इससे बढ़ कर सुबूत
न दे सके अपनी चाहत का
रोज रात पुर्जे-पुर्जे कर
सुबह जोडते रहे टुकड़े तेरी तस्वीर के

Wednesday, October 13, 2010

मेरी १०१ कवितायेँ


(६)

ऐसी दौलत के तलबगार नहीं
तुम्हारी किताब में भले मालदार नहीं
जहाँ मकान पर मकान तो बन गए
अफ़सोस मगर घर उजड रहे हैं

शहर का हवा-पानी बदला है
वो अलग दौर था ये कुछ और
बच्चे तो ज़हीन और काबिल बन गए
बस मां-बाप बिगड रहे हैं

वो हर बार क्यूँ मुस्करा के मिले
एक उम्र लगी ये राज़ जानने में
सुनते हैं वो इक ज़माने से
भाई-भाई से लड़ रहे हैं

ये उनका फैसला है
मुझसे कोई सरोकार नहीं
बस इतना बताएं मेरी रहगुजर पे
वो बार बार क्यूँ मुड रहे हैं

ये ज़मीं हमारी, आसमां हमारा
हम इसी दुनिया के हैं
अब कौन उनसे पूछे
वो इतना क्यूँ उड़ रहे हैं


(७)

खुदा ये दिन भी
दिखाए मुझको
मैं रूठा रहूँ
वो मनाये मुझको

इतना आसां कहाँ
हुनर बदले का
हसरत ही रह गयी
इक बार वो मेरी तरह सताए मुझको

सब कुछ तो कहा
बाकी क्या रहा
अरमां अगर है तो
आज वो भी सुनाये मुझको

सुना है मेरा नाम न लेने का
अहद उठाया है
ये कैसी कसम है
शामो सहर वो गुनगुनाये मुझको

दिल के खेल में सनम
अब माहिर हो चले
गैर की महफ़िल में
वो बेवफा बताये मुझको


ऐ खुदा दिल के हाथों
इस क़दर मजबूर कर दे
भले न बात न करे
इक बार तो बुलाए मुझको

मुझमें खामियां हज़ार
मुझे कब इनकार
काश: ! वो मिटा के
फिर से बनाये मुझको


(८)

आखिर दिल की बस्ती
फिर क्यूँ वीरान हो
तुमने तो दुआ दी थी
तुमसे हर जगह इंसान हो

ये दौर किस शहर में
ले आया हमें
फर्क ही मिट गया
सुबह हो या शाम हो

मैंने कब तुमसे
फरिश्तों की तमन्ना की थी
हमसफ़र बस एक देता
जिसका गुनाहगारों में नाम हो

दोस्त ! हमारी गुजर मुमकिन नहीं
तेरे शहर में
यहाँ एक भी तो ऐसा न मिला
जो मुहब्बत में बदनाम हो


(9)


ज़मीर बेच अमीर
बन गए
ईमान के अच्छे दाम मिले
तेरे शहर में

ठंडी आहें. . दिल में आग
आँखें अश्कबार
हमें तीनों मौसम एक साथ मिले
तेरे शहर में

तेरा नाम .. तेरा ख्याल
तेरी याद ... तेरा गम
दीवाने को कितने काम मिले
तेरे शहर में

कुछ यूँ सूखा आँख का पानी
उम्मीद न थी, लोग अन्धों से भी
नज़रें चुराते मिले
तेरे शहर में

एक बात हम जान नहीं पाए
हमें जो अच्छे लगे
वो सभी क्यों बदनाम मिले
तेरे शहर में

(१०)

ये तेरी मुहब्बत किस मंज़र पे
ले आई दीवाने को
भीड़ में भी अकेला सा
फिरे है कोई

ये मेरा वहम है, सच है
या तिलिस्म तेरा
साफ़ दिखता नहीं पर
हर घड़ी सवाल सा करे है कोई

मैंने यादों को बहुत
गहरा दफनाया था
फिर क्यूँ सरे-शाम से ही
पीछा सा करे है कोई


(११)

तुमने कुछ कहा नहीं
मैंने कुछ बताया नहीं
फिर क्यूँ तेरा नाम लेके
बुलाए हैं लोग मुझे

ये मेरी चाहत की इंतिहा
नहीं तो और क्या है
पीता नहीं हूँ फिर भी
तेरी कसम देके पिलाये हैं लोग मुझे

सुना है हँसने के बाद
रोना लाजिमी है
मगर ऐसा कितना हँस लिए
इस जनम जी भर के रुलाये हैं लोग मुझे

तुम आओ तो एक एक के
किस्से बताऊँ तुम्हें
तुम आ रही हो, तुम आ रही हो
कह के बरसों सताए हैं लोग मुझे

सुना है जिसे शिद्दत से चाहो
ख्वाब में मिलने आता है
फिर क्यों देर रात तक
जगाए हैं लोग मुझे


(१२)

खास कुछ कहा नहीं
खास कुछ सुना नहीं
रात की कौन सी बात याद कर
वो शरमा के रह गए

उतने आसां कहाँ मसाइल मुहब्बत के
जवाब आते उम्र गुजर जाती है जाना
ऐसा क्या पूछ लिया तुमने
वो घबरा के रह गए

मेरे साथ ये हादसा अक्सर हुआ
इनकार समझें या इकरार
मेरे जिक्र आते ही
वो मुस्करा के रह गए