उसने मुझे बारहा सताया है बहुत आज भी वो बेवफा प्यारा है बहुत प्यार का था तो क्या हुआ ? मौसम तो फिर मौसम था, बदल गया सितमग़र बदलेगा ! मुझे यक़ीं था मेहरबां ने नाचीज़ को, वक़्त दिया है बहुत
आज भी सपने देखता हूं चाहे, अनचाहे देखताहूं बस एक ही सपना है जो सच होता है कभी ट्रेन छूट जाती है, कभी ग़लत ट्रेन कभी सही ट्रेन, ग़लत स्टेशन पर उतार देती है जाने वो सपना कब आयेगा जब सही ट्रेन सही समय सही स्टेशन पर उतारेगी और जब तक ये सपना नहीं आता मैं लौट आऊंगा और फिर सपने देखूंगा सपने देखता हूं इसलिये मैं जीता हूं सपने देखता हूं इसलिये मैं हूं
Monday, April 3, 2017
मैं हैरान परीशां हूं कोई नयी बात नहीं मेरा क़ातिल परेशां है मक़तल बंद देख
हर शख्स यहां पर वास्कोडिगामा, कोलंबस है आप से काम अटका हो, यही एक शर्त बस है
तुम हौऊ यार क्या तै क्या है गये कारे कऊआ से हते 'हैन्सम' है गये जे सहर आ के तुमे का है गयौ कालीचरन हमें कानोकान खबर हू न भई और तुम न जाने कब में 'ऑफुल' तै 'ऑसम' है गये
रोटी जैसी छोटी सी चीज़ की फिक़्र न कर तू ये देख बुत कितना दराज कद है तेरे हक़ में
तमाम उम्र इक इसी ख्वाब ने परीशां रखा कभी गाड़ी छूट गई, कभी रस्ता भुला गये
नज़रें झुकाये ही कर गये ये हाल दिले बेताब का नज़रें मिलती तो क्या होता हाल दिले बेताब का
नेकी कर रहा है या तिजारत कर रहा है वो मुहब्बत भी तोल-माप से कर रहा है हिसाब मांगे है मुझ से मेरे दिन रात का नींद चुरा के, चोर सीना जोरी कर रहा है तेरी मुहब्बत के मारों को दवा न दवाखाना मिला है अलबत्ता! ज़हर पिया, तब से कुछ-कुछ आराम मिला है