Friday, September 18, 2015



सयानों ने पीढ़ी दर पीढ़ी समझाया
“ जा तो रहे हो उस के नगर
किसी चीज़ को भी छूना मत ”
बस यहीं मात खा गये
देखते देखते कहाँ से कहाँ आ गये
हर नई पीढ़ी आदम की गलती दोहराती है
ये हमारे डी.एन ए. में है
“ मैं अपनी गलती खुद करूंगा/करूंगी “
ये ज़िद हर इंसान की साईकी में है

Monday, August 24, 2015

तुम्हें पाने का सपना सच क्यों न हुआ ?
सुबह-सुबह का था, फिर सच क्यों न हुआ ?
सुनते हैं ज़िंदगी हर कदम जुआ है !

महज़ एक बाजी जीतने का सपना सच क्यों न हुआ

Saturday, July 18, 2015

सवालों के जवाब तलाशती
हातिम सी उलझी ज़िंदगी
शीशे के शहर में भटकती
पत्थर की राजकुमारी सी ज़िंदगी
.

यूँ तो हर कहानी के आखिर में
शहज़ादे को मिलती रही शहज़ादी
न जाने क़िले के किस तहखाने में
हमेशा को क़ैद ज़िंदगी
.

तिलिस्म दुनियां के इतने आसां कहाँ ऐ दोस्त !
लम्हा लम्हा धूप-छाँव
लम्हा लम्हा आँसू-मुस्कान
मौत के कुँए में रोज़ क़रतब दिखाती ज़िंदगी