बहुत शौक़ था इन आंखो को रोशनी का लो जलता हुआ अपना आशियां देख लो ज़िंदगी आने का वादा कर कहां रुखसत हुई कैसे होती हैं इंतज़ार में आंख पत्थर देख लो जिस उम्मीद में थमी थी सांस लो वो भी खत्म हुई नामावर कसम खा सारे खत वापस दे गया ऐसा कोई पता ही नहीं शहर में यक़ीं न होतो खुद जा कर देख लो
तुम्ही कहो अब कैसे आयें लब पर गीत
प्यार के मुहब्बत की बाज़ी जीती मैंने खुद को हार के
सोने के धोखे में पीतल ले आए दोस्तो ! कभी हमसफ़र, कभी रहनुमा, कभी महबूब दुश्मन कितनी सूरतें बदल के आए दोस्तो ! मैं उम्र भर उसका इंतज़ार करता रह गया वो जनाज़े पे भी दबे पाँव संभल के आए दोस्तो ! सोने के धोखे में हम तो पीतल ले आए दोस्तो !
मतलबी मुझे कहता है वो शीरीं-लब किन लबों से करूं उसकी मुखालफत अब