Thursday, April 5, 2012

इक तरफा मुहब्बत में कोई हम सा न पाओगे

हमने कुल ज़माने से मुहब्बत की है

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अब जीने के यही कुछ असबाब हैं

मेरे सिरहाने तेरे कुछ ख्वाब हैं

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गँवा के खुद को, तुझे पाया है

तब जाकर कहीं होश आया है

क्या कुफ़्र ? और क्या है इबादत ?

ये कब कोई जान पाया है ?

तुम महफ़ूज रहो अपनी

रिवाज़ों की दुनिया में

यादें, दर्द, आँसू, ज़ख्म

जीने को मेरे पास बहुत सरमाया है


Wednesday, March 14, 2012


ऐ नामावर ! नाम तक तो ठीक था
तूने क्यों इस क़ातिल को मेरा पता बता दिया
सोया था दर्दे इश्क़, ज़हन के किसी कोने में
तुमने आके क्यों इसे जगा दिया
तुम्हें जानने से पहले जाना न था दर्द मैंने
मेरे मेहरबां ये कैसा मर्ज़ लगा दिया
मेरी इसरारे वफा से जब आ गये आज़िज़ वो
उन्होने मुझे ही बेवफा बता दिया

Tuesday, March 13, 2012

मेरे हिस्से में तो
उनकी बेरुखी भी न आई
खुशकिस्मत हैं वो जिनकी
मुहब्बत को ठुकरा दिया तूने
सांसें सीमित हैं
धड़कनें हैं बहुत अल्प
तिस पर जानलेवा
तुम्हारा ये दृढ़संकल्प

तुम्हें निमंत्रित करने की
लुभाने की चाह मन में
अनगिनत बार उठी है
मैं चाह को भी तेरी तरह
चाह कर ही रह जाता हूं ...
पीर हृदय में बिन बुलाई आ बसती है
अब तो पीर ही मुझे

लुभा-लुभा के ताना कसती है
किसी और को न बुलाना
ये दिल तुम्हारा अब मेरी बस्ती है

Monday, February 20, 2012

गुम हो गए शख्स इख़लाक और आबरू वाले
अब गुलाब नज़र नही आते खुशबू वाले

Saturday, January 21, 2012

मज़दूर



मज़दूर किसी गम में
कभी काम बंद नही करता
काम बंद करने का मतलब
उसको मालूम है
उसको मालूम है काम बंद
करने का मतलब है
उसका और उसके कुटुम्ब का फाक़ा
और चार दिन के फाक़े का मतलब है
परचून की उधारी
उधारी ?
उधारी का मतलब है
महाज़न की देनदारी
और देनदारी का मतलब है
परबतिया..साबित्तरी और
नन्ही मुनिया की लाचारी
दिन में बंधुआ मज़दूरी और
और रात में ‘खिलवाड़ी’
जनम जनम की ख्वारी ..
ख्वारी और ख्वारी….
मज़दूर किसी गम में कभी
काम बंद नही करता
काम बंद करने का मतलब उसे मालूम
है