Thursday, July 7, 2011
मेरा ही खंजर
मेरे सीने में
उतार दिया.
आज उस ने
मेरा कर्ज़
उतार दिया.
तू जिये हज़ारों साल
तुझ पे अपनी जान का
सदका हमने
उतार दिया.
सियासत में शराफत
ढूँढते हो
यहाँ सबने अपना पानी
उतार दिया.
हासिल थी सभी नियामतें
फिर राज़ क्या है ? क्यूँ उसने
अपने भाइयों को मौत के घाट
उतार दिया.
हम अलमस्त रहे
अमीरी हो कि फकीरी
गो एक चोला पहना तो दूसरा
उतार दिया.
ज़िंदगी मेरे पास सही टिकट था सफर का
फिर क्यों कर आधी रात
मुझे जंगल में
उतार दिया.
Friday, July 1, 2011
Monday, June 6, 2011
Thursday, May 26, 2011
तेरे सीने से न सही
मेरे सीने से सही
मगर दिन-रात
उठता है धुआँ.
तक़दीर हम दोनों की
एक सी हमदम
मेरी खुशी धुआँ
तेरा ग़म धुआँ.
ये नसीब का सारा
खेल है ऐ दोस्त
अमीर मरे तो धुआँ
गरीब जिये तो धुआँ.
पिया क्या सिधारे परदेस
रात भर रोती रहीं आँखें
गीली लकड़ियाँ देर तक
देती रहीं धुआँ.
अश्कबार नज़रें यूँ भी
ना देख पातीं
मंजर तेरी जुदाई का
शुक्र है बन के गुबार,दरमियाँ आ गया धुआँ.
इश्क़ की थाह पा सके
ज़माने के बस की बात नहीं
जहाँ तक नज़र जायेगी
पाओगे मुहब्बतों का धुआँ.
Thursday, April 28, 2011
Tuesday, April 26, 2011
एक मुस्कान सी लगती है.
बचपन में लगी चोट है जो
एक मुस्कान सी लगती है.
उनसे मुलाक़ात ज़रूर
खुशी की बात होगी
जो भी मिल कर गया, चेहरे पे
एक मुस्कान सी लगती है
ये राज़ आवाम जान नहीं पाया
नेता जीते या हारे,
चेहरे पे
एक मुस्कान सी लगती है
साकी आज तू भी दो घूंट ले
मैं जब भी पीता हूँ
तेरे चेहरे पे
एक मुस्कान सी लगती है
महज़ इतना कहा था
'कल से नहीं पीऊँगा'
महफिल में सभी के चेहरे पे
एक मुस्कान सी लगती है
