Friday, October 8, 2010
मेरी १०१ कवितायेँ
तुम्हारी कही निभा रहा हूँ
देखो कितना खुश नज़र आ रहा हूँ
माथे की शिकन से लोग पहचान लेते हैं
रोज एक नया नकाब लगा रहा हूँ
लाख चाह कर भी मैं तेरे जैसा न बन सका
आज भी इबादत कि तरह दिल लगा रहा हूँ
वक्त के पाबन्द वो कल थे न आज
वो आयेंगे ज़रूर यही सोच उम्र बिता रहा हूँ
आना उनका मेरे ज़नाजे पे सौ नाज़ के साथ
नसीब देखिये वो आये हैं और मैं जा रहा हूँ.
इंसानियत की खुशबू से बावस्ता न रहे
वो कागज के फूलों से घर को सजाने निकले.
मेरे घर में आग लगी देख सबसे पहले
मोम से बने लोग मुझे बचाने निकले.
उनकी जफ़ा के किस्से शहर में रवां हैं
फिर किसके भरोसे वो दिल को लगाने निकले.
वही शोख नज़र, वही अल्हड़ बांकपन
यूँ तुमसे बिछुड़े ज़माने निकले.
दरख़्त वो ही हर बार क्यूँ गिर गए
जिन पर हम नशेमन बनाने निकले.
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मैं जिसे देखकर ताउम्र मुतासर रहा
वो बहते पानी पर बनी तस्वीर निकली
लोग जिनकी नाज़-ओ-अदा के दीवाने थे
बेवफाई ही उस बुत की तासीर निकली
हम जिनके तसव्वुर में घूमा किए रवां-रवां
सबसे हँस कर मिलना उस सितमगर की आदत निकली
...........
भटकन इतनी थी ज़िंदगी में
सारी ज़िंदगी ही भटकन बन गयी
वस्ल की एक घड़ी ने किया है वो काम
एक छोटी सी रात ज़िंदगी भर की तड़पन बन गयी.
.........
जिनसे हुए थे वायदे ताउम्र साथ निभाने के
वो साथ रह कर भी अजनबी हो गए.
एक के बाद एक, मेरे सभी ख्वाब
बस मुल्तवी हो गए.
अपने चाक गरेबाँ का ग़म नहीं मुझे
चल तेरे अरमान तो पूरे हो गए.
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अब जफाओं का हिसाब कौन रखे
ज़ख्म खाने की हो गयी आदत अपनी.
रातों का रोना भी क्या रोना
जब ग़म की क़ैदी है हर सुबह अपनी.
नहीं ये उनकी बददुआ का असर नहीं
बस होनी थी सो हो गयी ज़िंदगी तबाह अपनी.
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पेशा-ए-साकी बदनाम न कर
मेरे जाम में तू तंगदिली न कर.
तू मुहब्बत से पिलाये जा साकिया
आज ज़हर भी तेरे हाथ से हो जाएगा बेअसर.
तू जवाँ है मिल जायेंगे तुझे दीवाने सौ
मैं कहाँ ले जाऊँ अपना दीदा-ए-तर.
तू आबाद रहे मेरी दीवानगी का यही है मक़सद
अपनी तो होती आई है आगे भी हो जाएगी बशर.
.....................
आज फिर दिल में तन्हाइयों को
बुलंद करने का ख्याल आया.
इश्क़ को जिस्मानी कैद से रिहा
करने का ख्याल आया.
न कोई खुशी सी खुशी है
न किसी ग़म का ग़म
फिर क्यूँ बेखबर मुझे
बारहा तेरा ख्याल आया
.............
कभी सोचा न था हम तुम इतने
नज़दीक रह कर भी
दूर हो जायेंगे.
समाज की दीवारों पर लग जायेंगे
रिवाजों के काँटे और हम तुम इतने
मजबूर हो जायेंगे.
कुछ दबी जुबां में कहते हैं
कुछ आँखों में कहते हैं
पता न था, हम-तुम इतने
मशहूर हो जायेंगे.
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न आंसू के पैगाम उन तक पहुँचे
न आहों की आवाज पर ही वो आए.
क्या मेरा यार इतनी दूर है
दिल की आवाज भी नहीं सुन सकता.
सुबह होने को है अब तो आ जाए
अब मैं तारे भी नहीं गिन सकता .
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लो दर्द की पूँजी भी मुझसे छिन गयी
अब तो दवा ही मेरी दर्द बन गयी
चाहे जीवन काल को तू छोटा दे
आदमी को दर्द की दौलत लौटा दे
वैभव विलास का जब हो जाए बोझ भारी
आँसू उभर कर कहे व्यथा सारी
दर्द ही नहीं जिस महफिल में
वो फिर किसका निदान है
पीड़ा की अभिव्यक्ति ही तो मधुरतम गान है
रात नाम है निश्चय का
कुछ करने की तैयारी का
पश्चाताप का और संतोष की सवारी का
रात मनुष्य की सुप्त की सुरा है
रात से बढ़ कर नहीं सुबह है
कहो तुम यदि दर्द बुरा है
तो जान लो इतना
दर्द का न होना दर्द से भी बुरा है
जहाँ भर की खुशियाँ समेटने की दौड़ में
मैं टकरा गया अपनी ही अस्मिता से
और लड़खड़ा के इतनी दूर जा गिरा
मुझे फिर शुरू से शुरुआत करनी है.
ये माना जो वक्त था मिलने का
उसे निकले हुए एक उम्र बीत गई
शायद वो अब भी मुझे पहचान ले
दोस्त ! मुझे अपनी ज़िंदगी से मुलाक़ात करनी है.
सोचता हूँ अगर उसने न पहचाना तो ?
न पहचाना तो न सही
एक और इल्ज़ाम मेरे मुकद्दर के सर सही
डर तो इस बात का है अगर उसने
पहचान कर भी पहचानने से इंकार कर दिया तो ?
तो क्या होगा ?
सफर लंबा है
मेरी चाल धीमी है
और दिल में ?
बेशुमार अनहोनियों का डर है
जहाँ भर की खुशियाँ समेटने की दौड़ में
मैं टकरा गया हूँ अपनी ही अस्मिता से.
तारों की इन नज़रों को पहचान सखि !
चाँद की मुस्कराहट का अर्थ जान सखि !
कुछ सोच ! क्या तोड़ने के
लिए ही हैं मेरे अरमान सखि !
तारों की इन नज़रों को..
कुछ करो कि ये उम्र ठहर जाए
कुछ करो कि ये समय का चक्र ठहर जाए
हम-तुम रहें सदा
अब जैसे जवान सखि !
तारों कि इन नज़रों को...
इसलिये तो नहीं मेरे प्राण छटपटाए
इसलिये तो नहीं मैंने गीत बनाये
मैं तेरी याद में सुध-बुध खो बैठूँ
तू गुनगुनाए किसी और का गान सखि !
तारों की इन नज़रों को पहचान सखि !
चाँद की मुस्कराहट का अर्थ जान सखि !
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जवाँ अरमानों की लाश मिली थी
बदनाम बस्ती से कल रात
कुल शहर में पूछताछ की है
अभी तक शिनाख्त न हो सकी.
कहाँ जायेगी सबको पता है
कब जायेगी सबको खबर है
मगर लाश किस घर से निकली
ये बात अभी तक दरियाफ्त न हो सकी.
कब से मुफ्त की पी रहा है ज़ाहिद
उसे खुद भी याद नहीं
खुदा का फ़ज़ल देखिये,कहे है—
अभी तक आदत न हो सकी.
ज़माना कर रहा है उनके मुकद्दर पे रश्क
और वो खुद को बदनसीब कहते हैं
लाख कोशिश की मगर उन जैसी
किसी की किस्मत न हो सकी.
वाइज़ एक उम्र से बता रहा है
मेरी महबूब और खुदा में अन्तर
समझता हूँ, फिर भी महबूब की
शान में कोई गुस्ताखी न हो सकी.
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खुदा की नियामतें फीकी पड़ जाएँ
मेरा महबूब गर मेहरबा हो जाए
तुमसे संभले न संभलेंगे शिकवे मेरे
गर मेरे दिल के फकत इक जुबां हो जाए.
कब तक यूँ रोके रहोगे
मेरी हसरतों के सैलाब को
हर बार ज़ब्त किया
चलो तुम्हारी आरज़ू जवाँ ह जाए.
मेरे चाहने में न थी कमी कोई
मगर क्या करे कोई
यह ज़मीं
अगर आसमां हो जाए .
Respectability....?
Yes it’s mutual
Nonetheless being women we are far more vulnerable
Juggling many worlds
A well groomed daughter, a doting sister, a favorite daughter-in-law
Home-maker wife and affectionate mother
Pheeeew! How many hats, one can don
Reincarnated...?
Resurrected.....?
Nonetheless being women we are far more vulnerable
Lofty objectives to fulfill
Caring, endearing, tearful but smiling
Crying yet laughing
Perpetually at war to preserve our individuality
And seeking solace in divinity
A great feat indeed
Along the road 'on guard'
Excusing... Slipping... Escaping
Just in time from the
Preying vultures, antelopes on prowl
Oh 'advances' of those glib-tongued protectors
We have to keep an eye on
Protect our modesty and yet not appear offended
Much less sound offending
Learn young to interpret gestures
Process post-haste those verbal and not so verbal onslaughts
Jeering colleagues, ogling neighbors and 'extra kind' fellow passengers
And leering seniors
Yes being women we are far more vulnerable
We, the Man! The lesser mortal
“With inflated ego”
Seeking solace in ‘mythical fairies’
Ever groping in dark, mystical world
Where have all fairies disappeared?
Did they ever live here at first place?
No wonder we are emotional fools
Hasten to flaunt and waste our emotions
Misplaced flow drains us
Leaves us, devoid of solemnity and maturity
Leaves us lost in vast vacuum
"Man! When will we grow up?”
Always untidy, grotesque
Cluttering your lives with superfluous trivia
You who are forever jostling to treasure
Your ‘purity’
In this polluted world full of pompous men
With impure intentions
And yes if only we could be deported
To the utopia of fairies and queens
Umbilical chord intact, condemned to die
Ever waiting for those fairies and queens
Like a
Migrant, stranded for 'local' on a mega block day
In our bubble
Till someone bursts it
Crashing us face-down to coarse hard realities
Gratitude! Where it is due, that is you
For bridling the 'loose' us
When will we demystify and learn
To live in the ‘present’
Away from fake world of make believe celluloid
Fairies and queens do not live here anymore
They died long back
Rest in peace
Amen!
Tobacco kills...
Because it fouls breathe
Fouls mouth
Spoils teeth and gums
Causes incurable ulcers in mouth
Gives profuse sweating
Leads to giddiness
Mistakenly called a ‘High’
Envelopes the consumer in general fatigue
Leads to joint pain
Soils hanky and clothes
Is a drain on your purse
Brings you to stand with awkward people
Brings uncontrollable urge
Leads certainly and surely to cancer
So say ‘No’ to Tobacco
Today and always
( on the occasion of Anti-Tobacco Day 31st May 2010)